पूछते है सब मुझे कौन हूं मैं, खुद को ढूंढना ही है शायद यही मेरी पहचान, अपने अंदर चल रहे द्वंद में। होकर एक औरत सिमट जाना है क्या पहचान मेरी, हर रिश्ते में बंधकर खो गई है पहचान मेरी। रिश्तों की मूरत में न रही कोई सूरत मेरी, कहते है मुझको तू है हर घर के आधार। है तू धरा नहीं कोई बंजर सा घाट, कौन हूं मैं जो नहीं मेरे पास सपने देखने का अधिकार, रिश्तों में होकर खोया है मैने अपना आकार। मैं भी हूं इंसान ओर मुझको भी जीने की उमंग अपार, फिर भी पूछते हो मुझसे कौन हूं मैं, जबकि जानते हो मुझसे ही है तुम्हारा संसार।।
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