व्यथा

वनवासी पथ पर चल पड़ा, राजा नहीं, एक राम था। धर्म निभाने निकला था, पर हृदय में घनघोर घाव था। जनकनंदिनी दूर कहीं, अश्रु बहाती रो रही होगी, मेरे बिना इस वन-पथ में, कैसी होगी, क्या सह रही होगी? लंका में सोने के महल हैं, पर वहाँ प्रेम न कोई, न साथ है। राजसिंहासन व्यर्थ पड़ा है, जब जीवन ही बन गया जंजाल है। वन में भी तुम संग थीं, अब मन में भी बस तुम ही हो। पर आँखों से जो ओझल हुईं, तो जीवन का अर्थ ही शून्य हो। सीते! क्या मेरा धर्म ही बाधा था? या ये विधि का लेखा था? सुनसान रात्रि में तेरा नाम लूँ, तो झरनों का स्वर भी रोता था। हे पृथ्वी, कहो क्या न्याय यही? कि राम हो, पर सीता नहीं! राजा बनूँ, पर प्रीत विहीन, क्या यही विधि की रीत सही?


: Raahi
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