परछाई

रात के ग्यारह बजे थे। खिड़की के बाहर चाँद अधूरा था, और कमरे में टेबल लैम्प की हल्की रौशनी दीवार पर एक लम्बी परछाई बना रही थी मेरी परछाई। मैं हमेशा सोचता था कि परछाई सिर्फ रौशनी का खेल है, लेकिन उस रात मुझे पहली बार एहसास हुआ कि हर परछाई के भीतर एक कहानी, एक रहस्य छिपा होता है। मैं अपनी डायरी लिख रहा था "आज भी वही अकेलापन… वही सन्नाटा…” इतना लिखकर जैसे ही पेन रखा, दीवार पर दिखी मेरी परछाई ने सिर हिलाया। पहले तो मुझे लगा कि मेरी आँखें धोखा दे रही हैं, पर जब मैंने सिर झुकाया तो उसने नहीं। वह वहीं खड़ी रही… सीधी, स्थिर… और मुस्कुरा रही थी। मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। दो साल पहले, इसी कमरे में मेरी जुड़वां बहन रिया की मौत हुई थी। कहते हैं, उसने खुदकुशी की थी। पर मैं जानता था, वो कभी ऐसा नहीं कर सकती थी। उस दिन भी उसकी परछाई कमरे से बाहर भागी थी पर खुद रिया दीवार के पास गिर गई थी। और अब, जब मेरी परछाई मुस्कुराई, तो उसकी मुस्कान रिया जैसी थी। मैं काँपते हुए बोला “कौन हो तुम?” दीवार से आवाज़ आई, धीमी लेकिन साफ़ “तुम्हारी परछाई नहीं… तुम्हारा अधूरा अतीत हूँ।” मैं घबराकर पीछे हट गया “रिया?” “हाँ… तुमने मुझे भूलने की कोशिश की, पर मैं तुम्हारे साथ हर दिन, हर शाम रही हूँ। जब भी रौशनी जलाते हो, मैं तुम्हें देखने लौट आती हूँ।” मैंने काँपते हाथों से लैम्प बंद किया। अंधेरा छा गया। लेकिन… आवाज़ अब भी आ रही थी। “तुम रौशनी से भागोगे, तो अंधेरा तुम्हारा पीछा करेगा,” उसने कहा। “जिस सच्चाई से तुम डरते हो, वही तुम्हें खत्म कर देगी।” कमरे में ठंडी हवा चली। परदे हिले। मैंने दुबारा लैम्प जलाया पर दीवार पर अब दो परछाइयाँ थीं। एक मेरी… और दूसरी, जो मेरे साथ नहीं, मेरे सामने खड़ी थी। उसने कहा “सच बता दो… उस रात क्या हुआ था?” मैं चिल्ला उठा “मैंने नहीं मारा उसे! वो खुद गिर गई थी!” पर परछाई हँसने लगी “झूठ बोलने की आदत पुरानी है, अर्जुन…” अचानक मेरी गर्दन पर किसी ने हाथ रखा। ठंडा, सर्द, काँपता हुआ। मैं पलटा कोई नहीं था। पर दीवार पर अब मेरी परछाई गला दबाकर गिर रही थी। मैं बेहोश हो गया। सूरज उगा, पड़ोसी ने दरवाज़ा तोड़ा। कमरे में मैं था दीवार के पास, गिरे हुए लैम्प के बगल में। चेहरे पर भय का भाव जम गया था। दीवार पर, अब भी दो परछाइयाँ थीं एक खिड़की के पार की रौशनी से बनी और दूसरी… जो रौशनी से उलटी दिशा में खड़ी थी। और आज तक लोग कहते हैं... रात के सन्नाटे में अगर उस घर में रौशनी की एक किरण भी पड़ जाए, तो दीवार पर दो परछाइयाँ नाचती दिखाई देती हैं। एक ज़िंदा की… और एक उसके अधूरे सच की।

12 Views
Time : 2 Min

All Right Reserved
दैनिक प्रतियोगिता

लेखक : Bunyy
img

All Chapters