एक छोटे कस्बे में आदित्य नाम का युवक रहता था। पढ़ाई ख़त्म करने के बाद उसके पास बहुत समय था, पर वह अक्सर सोचता “आख़िर मैं ऐसा क्या करूँ जिससे समाज को थोड़ा बेहतर बना सकूँ?” एक दिन कस्बे के पुराने मंदिर के पास से गुज़रते हुए उसने देखा कि कुछ बच्चे कूड़े-कचरे के ढेर के पास खेल रहे हैं। पास ही कुछ बुज़ुर्ग पेड़ के नीचे बैठे खाँस रहे थे। आदित्य का दिल भर आया। वह सोचने लगा “सरकार अपनी जगह काम करती है, लेकिन अगर हम युवा आगे बढ़कर स्वेच्छा से कुछ करें, तो बहुत कुछ बदल सकता है।” उसने दोस्तों को बुलाया और कहा “क्यों न हम हर रविवार को एक घंटा समाज के लिए दें? न कोई मजबूरी, न कोई दिखावा… सिर्फ़ स्वैच्छिक सेवा।” शुरुआत में पाँच दोस्त उसके साथ आए। उन्होंने सबसे पहले मंदिर और उसके आसपास की सफ़ाई की। बुज़ुर्गों के लिए बैठने की लकड़ी की बेंच बनाई। धीरे-धीरे लोग उनकी कोशिश देखकर जुड़ते गए। एक साल में वही जगह बदल गई, गंदगी की जगह फूलों का बगीचा था। बच्चे अब साफ़ मैदान में खेलते थे। बुज़ुर्गों के लिए लाइब्रेरी और चाय का कोना बना। जब कस्बे के लोग आदित्य से पूछते “तुम्हें इसके लिए कोई पैसा मिलता है?” वह मुस्कुराकर कहता “नहीं, ये तो मेरी स्वैच्छिक सेवा है। असली इनाम तो वो मुस्कान है जो बच्चों और बुज़ुर्गों के चेहरे पर दिखती है।” सीख: स्वैच्छिक सेवा का असली सुख निस्वार्थ भाव में है। जब हम बिना किसी स्वार्थ के समाज के लिए कुछ करते हैं, तो उसका असर एक चिंगारी की तरह पूरे गाँव, पूरे शहर और पूरे देश को रोशन कर देता है।
© Copyright 2023 All Rights Reserved