एक बड़े शहर में सत्यनारायण नाम के एक ईमानदार अफ़सर रहते थे। उनका मानना था कि – “देश तभी आगे बढ़ सकता है जब हर इंसान अपनी ज़िम्मेदारी ईमानदारी से निभाए।” लेकिन उनके दफ़्तर में ज्यादातर लोग रिश्वत लेते थे। कोई फाइल तभी आगे बढ़ती जब जेब गर्म हो। धीरे-धीरे ये आदत इतनी गहरी हो गई कि लोग दफ़्तर को “घूसख़ोरी का अड्डा” कहने लगे। सत्यनारायण अक्सर अपने साथियों से कहते “दोस्तों! ये रिश्वत क्या है जानते हो? ये दीमक है। बाहर से सबकुछ ठीक दिखता है, लेकिन अंदर से पूरा तंत्र खोखला कर देती है।” सहकर्मी मज़ाक उड़ाते “अरे साहब! आप ज़्यादा भावुक हो जाते हैं। बिना तेल के गाड़ी नहीं चलती।” कुछ सालों बाद वही दफ़्तर भ्रष्टाचार से इतना खोखला हो गया कि वहाँ बड़े घोटाले होने लगे। सरकारी योजनाओं का पैसा नेताओं और अधिकारियों की जेब में चला गया। स्कूल, अस्पताल, सड़कें सब अधूरी रह गईं। जनता परेशान हो उठी। लोग कहते “हमारे बच्चों को शिक्षा नहीं मिल रही, इलाज नहीं हो रहा, सड़कों पर गड्ढे हैं… आखिर दोषी कौन है?” तब सत्यनारायण ने गाँव-गाँव जाकर लोगों को समझाया – “भ्रष्टाचार कोई बाहर से आने वाला राक्षस नहीं है। ये हमारे ही भीतर का लोभ है। जब हम सुविधा के लिए रिश्वत देते हैं, तो हम भी उस दीमक को मजबूत करते हैं।” धीरे-धीरे लोग जागरूक होने लगे। उन्होंने रिश्वत देना बंद किया। कुछ ईमानदार अफ़सर भी सत्यनारायण से जुड़े। और जब जनता व व्यवस्था साथ खड़ी हुई, तो भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ़ सख्त कदम उठाए गए। सीख: भ्रष्टाचार सच में दीमक की तरह है जो धीरे-धीरे तंत्र को खोखला कर देता है। जब तक हम सब मिलकर इसे रोकने का संकल्प नहीं लेते, तब तक देश मज़बूत नहीं बन सकता।
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