मेहर ओ माह ( सूरज और चाँद

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मेहर ओ माह ( सूरज और चाँद


क्या सच हैं क्या फ़रेब इसी उलझन मैं उलझ गई हूँ मैं, सच की तलास मैं ख़ुद को कहीं खो बैठी हूँ मैं! पता नहीं क्यों पर अपने आप पर भी अब मुझे तरस आता हैं! ख़ुद की बेबसी पर अब मुझे रोना आता हैं! मालूम नहीं क्या उलझन सता रही हैं मुझे, पर मैं अब ख़ुद को सता रही हूँ! मैं नहीं जानती क्या पाना चाहती हूँ मैं पर अब सब गवा रही हूँ मैं! नज़रे उठाने के काबिल मैं अपने आप को नहीं समझती फ़िर भी समझाती हूँ खुद को मैं! डरती हूँ अपने ही वजूद से मैं! बातों को टालना या इनकार करना आया ही नहीं मुझे क्यों की बात टलने पर होती अज़ीयत से वाक़िफ़ हूँ मैं! खामोशी मुझे तोड़ रही हैं अंदर से पर फ़िर भी रिश्ता मैने उसी से जोड़ रखा हैं! बेबसी से वाक़िफ़ हूँ मैं क्यों की उसी संग रिश्ता गहरा हैं मेरा!

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