कहाँनी जो शिकायतों से भरी हैं, ख़ुद से या खुदा से, पता नहीं पर लडाई मोहब्बत मैं अज़ीब हैं ना पर यही हैं, मेहर- ओ- माह मतलब सूरज और चाँद जिनका एक होना मुमकिन नहीं तो मतलब क्या हैं मेहर ओ माह, या मोहब्बत का बस यही कहानी हैं जो ख़ुद से जंग की हैं!
" बस करे, मेरी भी जिंदगी हैं, मेरी ख़ुद की भी ख़्वाहीसे हैं, मुझे तकलीफ़ होतीं, कुछ कहती नहीं इसका हरगिज़ ये मतलब नहीं हैं की मुझे अज़ीयत नहीं होती मुझे भी अज़ीयत होतीं हैं " आवाज़ साफ़ ज़ाहिर कर रही थी उसकी अज़ीयत उसकी तकलीफ़!!
"तो इन सब मैं मेरा क्या कसूर, मेरी क्या गलती "
"कसूर, आपका नहीं मेरा हैं मेरा! गलती कीसी की नहीं, गलत मैं हूँ"
" फ़िर सज़ा मुझे क्यों?"
" फ़िर मोहब्बत कैसी?"
" इम्तेहाँन लिया जा रहा है "
"नहीं, सच बताया जा रहा है"