प्रेम अनंत, प्रेम अपरंपार,
जैसे गंगा की धारा, निर्मल और अपार।
न माप सके इसे शब्दों के तराजू में,
यह तो है आत्मा का सबसे सुंदर आकार।
कभी यह राधा के मन में बसता है,
तो कभी मीरा के गीतों में हंसता है।
कभी शिव की तपस्या में समर्पित,
तो कभी पार्वती की भक्ति में अर्पित।
यह वह दीप है जो तम में जलता,
यह वह पुष्प है जो हर मौसम में खिलता।
सूरज की गर्मी, चांदनी की ठंडक,
प्रेम हर पल देता है सुख की झलक।
यह सांसों की वह लय है,
जो जन्म-जन्मांतर तक बसी है।
यह कन्हैया की बांसुरी का राग है,
जो गोपियों के हृदय का अनुराग है।
प्रेम त्याग है, समर्पण है,
यह अपने भीतर जलने का अर्पण है।
कोई सीमा नहीं, कोई बंधन नहीं,
यह तो है मुक्त, जैसा ब्रह्मा का आशीर्वाद कहीं।
कभी यह माता-पिता के चरणों में झुकता है,
कभी बच्चों की हंसी में झलकता है।
यह वह शीतल छांव है जो सबको ढांप ले,
यह वह आग है जो हर भय को भस्म कर दे।
प्रेम कोई सौदा नहीं, कोई व्यापार नहीं,
यह तो है मनुष्य का सबसे पवित्र संस्कार सही।
राम और सीता का आदर्श प्रेम,
जो धैर्य, मर्यादा और स्नेह से भरा है।
तो क्यों न हम प्रेम को अपनाएं,
अपने हृदय को इसका घर बनाएं।
क्योंकि प्रेम ही वह अनमोल मणि है,
जो इस जीवन को अर्थवान बनाती है।