राजा के मंत्रीगण भी बिल्कुल राजा के जैसे थे। न वे ईमानदार थे, न ही कर्मठ। वे केवल अपनी जेबें भरने में लगे रहते। अगर कोई किसान अपनी फरियाद लेकर दरबार में आता, तो उसकी आवाज को अनसुना कर दिया जाता। किसी के साथ अन्याय होता, तो उसे न्याय मिलने की कोई संभावना नहीं थी।