दीये का अभिमान
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दीये का अभिमान
कविता
शशि भी मिटा नहीं पाता है अंदर का अँधियारा। मैं ही घर के कोने-कोने को करता उजियारा। इस घमंड में सिर ऊँचा कर लगा व्योम में दृष्टि। अहंकार की आँखों से वह देख रहा था सृष्टि।
: rani
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