असम्भव कुछ भी नहीं
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असम्भव कुछ भी नहीं
कविता
उदित होता सूरज नव उमंग लिए बड़ता जाता हर पल नव तरंग लिए तू भी भर अनंत प्रकश उर्जा नभ (gagan) अपने अन्दर (sab prachand) आगे बड बढ़ता जा नव प्रसंग लिए सम्भव है सब कुछ असम्भव कुछ भी नहीं कर होसले बुलंद दूर कुछ भी नही
: Writer Dev
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