ठंडी भरी रात
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ठंडी भरी रात
कविता
शीत हवाएँ डोल रही, हो रही कोहरे की बौछार, चारदीवारी नसीब नहीं झेल रहे ठंड की मार, जहाँ सो रहे थे वहाँ कुछ लकड़ियाँ सुलग रही थी, फटे हुए कंबल में दुबके जैसे हड्डियाँ हिल रही थी I
लेखक : Writer Dev
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