जुदाई
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जुदाई
कविता
सूरज तो अपनी ही धुन में है मशगूल गुस्से से लाल आसमाँ हो रहा है गलियों में अब आना जाना है मुश्किल अजीब-ओ-ग़रीब ये जहाँ हो रहा है
लेखक : Rahul
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