आंसुओं का तमाशा
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आंसुओं का तमाशा
कविता
आंसू जो गिरें, वो दास्तां बयां करते रहे, हर हंसी के पीछे ज़ख्म छुपे रहते रहे। इश्क़ मेरा कोई मज़ाक नहीं था, यारा, जमाना समझ न सका, और हम सहते रहे।
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