आहत मन
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आहत मन
कविता
ऐसा तो पहली बार नही है, आहत मन पहली बार नही है। कुछ अपने और परायों से, स्वाद चखा कई बार यहीं है। फिर मन तू क्यों रोता है...? ऐसा तो अक्सर होता है।
: निर्मेश
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