खूसट ताई
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खूसट ताई
कविता
एक दिन मैं भी सास बनूंगी, मैं भी नखरे खूब करूंगी। बैठ आंगन में चारपाई पर, हाथ पर अपने हाथ मैं धर कर। बहू बहु चिल्लाऊंगी, पास उसे बुलाऊंगी। तभी ताई ने आवाज लगाई, ख्वाबों से बहू बाहर आई।
: निर्मेश
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