बंदर और मदारी
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बंदर और मदारी
कविता
मदारी के इशारे, बंदर की वफ़ा, रिश्ते में छिपी रहती है कैसी दगा। ना हुकूमत चले, ना गुलामी रहे, प्यार में बस बराबरी का नाम रहे।
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