कैसे कहें तुम से, तुम्हारी सोच ने हमे, जिस्म से जिन्दा, और ज़हन से अपाहिज बनाया, ये जो तुम्हारी याद है! बिना तुम्हारी इज़ाजत के हम से मिलने चली आई, बहुत कोशिश की न मिले की, इसे इन्कार करने की हिमाकत भी न कर पाई, ये जो तुम्हारी याद है ! बहुत सालो बाद हम से मिलने चली आई ये याद रहने की बिमारी मुझ में न जाने कब लग चली आई जो भूलना चाहा वो और याद होता जाए, ज़हन जलता है, शरीर ठंड से कपकपाए, ये जो तुम्हारी याद है ! बहुत मिटाने की कोशिश तो की, मगर मिटा नही पाई, हर बार ज़ेहन में याद बन कर दोड़ी चली आई, कई बार भूल जाने की कसम खाई, खुद ने ही खुद से ली दुहाई, फिर भी न जाने क्यों? ये जो तुम्हारी याद है ! हमारी आंखों में तुम्हारी तस्वीर बन कर चली आई ॥