हाथी पेड़ पर चढ़ रहा था
पपीता, पीपल से झड़ रहा था
बबूल के पेड़ पर आम लगे है
मूर्खों के अब दाम लगे हैं।
धांधली करने वाले का ईमान है
सच्चा यहां बस बेईमान है
पानी की बाल्टी में दूध भर रहा था
नदी में बैठा प्यासा मर रहा था।
जूता सिर पे लिए नाच रहे हैं
अनपढ़ प्रवचन बांच रहे हैं।
ज्ञानी को कोई ज्ञान नहीं है
क्या होगा इसका ध्यान नहीं है
दर दर पर हाथ जोड़े छल रहा था
टोपी पहिने, सबको पहिनाते चल रहा था।
सब उल्टा उल्टा हो रहा, किसी का कोई मेल नहीं है
सब खेल गए खेलने वाले, कहकर उनका खेल नहीं है।
~Mr.Love