एक थीं बुलबुल,✨

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एक थीं बुलबुल,✨


यह कहानी कोई नई नहीं हैं शायद आप में से बहुत लोग सुन भी चुके होगें मगर मुझे यह बहुत अच्छी लगीं और दिल को छु गई, शायद आप को भी पढ़ कर अच्छी लगे। "एक थीं बुलबुल" एक दीन एक बुलबुल ज़ख्मी होकर एक दरख़्त पर गिर पड़ी, वो पेड़ था सफ़ेद गुलाब का। उस गुलाब के पत्तों ने भी बड़ी सहानुभूति से बुलबुल को अपनी आगोश में पनाह दी, बुलबुल ने उन पत्तों में शिफा पाई और उस दरख़्त में ख़ुद को महफूज़ समझने लगी। उस गुलाब के पेड़ पर एक खुबसूरत सा गुलाब खिला था जो देखने में सबसे खुबसूरत था और इस बात का उस गुलाब को भी गुरुर था। उसके लिए बुलबुल एक मात्र जीव थीं जिसने उसके दरख़्त पर पनाह ली थी इसके अलावा और कुछ नहीं...... मगर बुलबुल के दिल में उस गुलाब की तस्वीर छप गई थी, बुलबुल उस गुलाब की ओर खींचती चली गई और वहा रहते बुलबुल को उस गुलाब की आदत सी होने लगी और उसे गुलाब से प्यार हों गया। अब बुलबुल पुरी तरह तंदुरुस्त हों गई थी और खुशी में उस दिन बुलबुल ने गुलाब को गले लगा लिया...गले लगाते ही गुलाब के काटे बुलबुल को चुभने लगे और एक बूंद खून बुलबुल का गुलाब पर गिर गया। पहले तो गुलाब ने बुलबुल को ख़ुद से दूर कर दिया मगर अगले ही पल गुलाब को महसूस हुआ...उस बुलबुल के खून के एक कतरे से गुलाब अपनी खूबसूरती और बिखेरने लगा था.... अपनी खूबसूरती के गुरुर में गुलाब सर ऊंचा कर के आसमान को निहारने लगा...गुलाब अब और भी ज्यादा महकने लगा। ऐसे ही दीन गुजरने लगे और अब गुलाब को भी उस बुलबुल से प्यार होने लगा...मगर जब भी बुलबुल गुलाब को गले लगाती बुलबुल को अपने खून का एक कतरा बहाना था.... मगर गुलाब के लिए वो खून पानी था, जिसका उसे कोई अफ़सोस न था। बुलबुल के खून से गुलाब की रंगत बढ़ने लगी और अब वो सुर्ख़ लाल रंग में बदलता गया.... मगर बुलबुल अपने खून का कतरा कतरा बहा कर ख़ुद बेरंग हों गई और जिस दिन गुलाब सुर्ख लाल रंग में तब्दील हों गया बुलबुल उस दरख़्त से गिर गईं और मर गईं।।

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