वह झील भी कितनी रोई होगी

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वह झील भी कितनी रोई होगी


दरिंदों ने बस पूरा जिस्म ही नोच दिया था। पर समाज ने तो आत्मा को भी झकझोर दिया था ना थी कोई गलती उसकी फिर भी गलत उसे ठहराया गया निकली थी वह सूट सलवार पहनकर पर सूट में पीछे लगी डोरी को भी गलत बताया गया। कह दिया फैशन में चली थी यह तो होना ही था खुद ही दिया उनको मौका अब इज्जत तो जाना ही था वह खुद ही उनकी मर्दानगी को जगा आई वहां जाकर अपनी आबरू खुद ही लुटा अाई। अब भुगते अपना परिणाम हो गई अब हर जगह बदनाम यह कुलटा पूरे गांव को करेगी बर्बाद इससे अच्छा कर दिया जाए उसका  बहिष्कार सदमा ना सहन हो पाया  बाप गया  फंदे से लटक। देख बाप की लाश मां मर गई सर पटक पटक। दुनिया में रह गई अब अकेले आबरू से घर तक की बर्बादी देखने लग गए वहां मेले तोड़ दिया उसे समाज के तानो ने खोखला कर दिया उसे इंसान रूपी दानव ने। फिर उसने सब कुछ छोड़ दिया अपनी सांसों की डोर खुद ही तोड़ दिया। जहां वह जाकर मौत की नींद सोई होगी। वह झील भी कितनी रोई होगी।

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