खेल और किलकारियां
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खेल और किलकारियां
कविता
कागज की नावें, वो बारिश की बूंदें, बचपन की यादें हैं, जो दिल में बसी हैं। अब वो खेल नहीं, न वो मस्ती का आलम, पर यादें हैं अनमोल, जैसे प्यारा सा संगम।
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