वो तारीख़....

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वो तारीख़....


वो तारीखों की तरह रिश्ते बदलता गया, हम निभाते गए, और वो आगे चलता गया। बहुत आम था उसके लिए किसी को रिझाना, या कहूं पेशा ही था उसका दूसरों को फसाना। साल से महीना और महीने से दिन चलाता गया, वो तारीखों की तरह रिश्ते बदलता गया। उसका आना मेरे लिए बहुत खास था, लेकिन मेरा उसको सब कुछ मानना, उसके लिए मजाक था। फरेब का नकाब ओढ़,वो रंग रंगता गया। वो तारीखों की तरह रिश्ते बदलता गया। - kj
लेखक : Kj

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