लज्जा ( स्वभिमान की ललकार)
शर्म हया और लाज एक स्त्री का गहना है, पर इन शब्दो का प्रयोग करके एक स्त्री के स्वभिमान को बार-बार छलनी किया जाता है, और उसको चार दीवारो मे कैद और कमजोर बनाने के लिए इन शब्दो का प्रयोग किया जाता है। आज की कविता के माध्यम से मैं सिर्फ इतना बताना चाहती हूं, कोई भी औरत (बेटी, बहन, पत्नी, माता) अपने ऊपर उठे इन तीरो से अपने दिल को तब तक छलनी ना करे, जब तक वह स्वयं गलत ना हो, वो कहते है ना कुछ तो लोग कहेंगे, लोगो का काम है कहना😀 चलिए कविता पढते है मेरे यानि चारू के साथ। अपने विचार जरूर प्रस्तुत कीजिएगा।