एकलव्य : एक अद्वितया समर्पण
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एकलव्य : एक अद्वितया समर्पण
कविता
मेरे मन में ठानी, हार मानूँगा नहीं, गुरु की प्रतिमा बनाई, मिट्टी से सजाई। उस प्रतिमा को ही मान लिया गुरु, साधना की राह में खुद को समर्पित किया।
लेखक : Samridhi
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