वो रात

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वो रात


बात उन दिनों की है जब मैं एक कॉलेज में पढ़ती थी... घर की स्तिथि ठीक न होने के वजह से मैंने कॉलेज की पढ़ाई के साथ साथ एक नोकरी करने का फैसला किया ...जैसे तैसे मुझे माँ की पहचान की एक महिला ने अपने बेटे के क्लिनिक में काम दिलवा दिया ... जो की एक महिलायों के लिए क्लिनिक था जहाँ उनका बेटा और  बहु मिलकर काम करते थे .. जब मैं पहले दिन क्लिनिक गई तो उन्होंने माँ को यही कहा कि पहले इसे काम सिखाना होगा उसके बाद तंख्वा तेह करेंगे । ज़रूरत होने के कारन हमने हा करदी . . वैसे ये मेरी पहली नोकरी थी और उस समय ओन लाइन क्लासेस होती थी जो कि दोपहर 2 बजे तक खतम हो जाती थी और 2.30 बजे दोपहर को मुझे अगले दिन से वहाँ बुलाया गया ... वो एक छोटा क्लिनिक था सामने दरवाजा खोलते ही साइड में मेडिकल स्टोर और सामने डॉक्टर का रूम ... मरीजों को admit करने के लिए वहाँ अलग से जगह थी जो कि डॉक्टर के कैबिन से थोड़ी दूर थी वहाँ जाने के रास्ते में ओपरेशन थेटर था और ओपरेशन थेटर के बाहर सामने एक बिस्तर था जैसा कि मरीजों के लिए होता है.. उसके अगले कमरे में इक्कठे 6 बेड थे जो कि मरीजों को admit करने के लिए वहाँ रखे थे .. मेरे साथ वहाँ और एक महिला थी .. पहले दिन तो मुझे bp चेक करना सिखाया गया और मरीजों की स्लिप बनाना सिखाया गया ..इस दौरान मेरे साथ काम करने वाली ऑन्टी से मेरी बनने लगी ...उनसे बात करने पर पता चला कि मेरे इलावा वहाँ सभी अधेर उमर की महिलाएं काम करती हैं ... और जो बेड मैंने ओपरेशन थेटर के बाहर देखा था वो नाईट स्टाफ इस्तेमाल करता है और रात को मरीज़ न हो तो रात वाली औरते वहाँ सो जाती हैं वहाँ मेरे होते हुए शाम को डॉक्टर आते थे मरीजों को देखने 6 से 7 और 7.30  बजे मैं घर आ जाती...ऐसे ही सुबह मैं उठ कर नहा कर खाना खाते ही ऑन लाइन क्लासेस लगाने बैठ जाती और 2 बजे क्लासेस खतम होते ही क्लिनिक के लिए निकल जाती और वहाँ 2.30 बजे तक पहुँच जाती और वहाँ काम सीख ते हुए मुझे करीब करीब एक हफ्ता हो गया... सब ठीक चल रहा था मुझे काम भी आने लगा था जब नाईट शिफ्ट करने वाली एक महिला ने अचानक आने से मना कर दिया । तब डॉक्टर ने मुझे बुलाया और नाईट शिफ्ट करने को कहा,,, एक दिन के लिए,.... घर आकर मैंने बताया और अगले दिन मैं 6.30 बजे शाम को क्लिनिक जाने के लिए निकल गई .. करीब आधा घंटा पैदल चलने के बादमैं वहाँ पहुँच ही गई। और जाते ही मरीजों को देखने लगी । 7.30 बजे तक डॉक्टर चलेगए.... और 7.30 se 8 बजेतक मैं वहाँ अकेली थी क्योंकि दूसरी महिला 8.10 तक वहाँ आया करती थी .. मैंने पहली बार रात को वहाँ का नज़ारा देखा... कोई भी मरीज़ न होने के वजह से सामने का वार्ड सुनसान और भूतिया लग रहा था... बाहर देखने के लिए मैं दरवाज़े के पास गई जो कि पारदर्शी था जिससे बाहर  का सब दिखता था...बाहर सड़क परभी  अवाजाई नके बराबर थी क्योंकि वो क्लिनिक के सामने एक ही दुकान थीजो  की 6.30 बजे बंद हो जाती... वो इलाका भी सुनसान था क्योंकि वहाँ ज्यादा घर नही थे और एक फैक्टरी थी जो कि काफी आगे जाकर थी.... मैंने बाहर का नज़ारा देख कर अंदर से दरवाजा बंद कर लिया और आकर डॉक्टर के कैबिन के बाहर लगे सोफा पर बैठ कर ऑन्टी का इंतज़ार करने लगी । लगभग 8.15 बजे वो आ गई उन्हे देखकर  मैंने दरवाजा खोला जिससे मेरी जान में जान आई । वो ऑन्टी मेरे साथ आकर बैठ गई.. मुझे शुरू से ही कम बोलना पसंद है पर ऑन्टी तो जैसेचुप होने का नाम ही नही ले रही  थी.. बातों बातों में ऑन्टी ने मुझसे बहुत से सवाल किये जिनका जवाब मैंने कम शब्दों में दिया... ऐसे ही उनकी बातें सुनते सुनते रात के दस बज गए.. ऑन्टी ने अपना बिस्तर उसी सोफा पर जमा लिया और वहाँ लेट गई... मुझे आपरेशन थेटर् के बाहर वाले बेड पर जाने को कह दिया.. एक वही जगह थी जहाँ कैमरा नहीथा क्योंकि कुछ दिन पहले  ही एक शॉर्ट सेर्किट् से वो खराब हो गया था,.... मै ऑन्टी को देखते हुए वहाँ बेड पर बैठ गयी जहाँ पर लेटने के बाद सामने का मरीज़ वार्ड दिख रहा था जहाँ इस समय कोई नही था और मेरे सामने आपरेशन थेटर का दरवाज़ा था... ऑन्टी तो लेटने के बाद 15 मिनट में ही सो गई और उन्हे वहाँ रहने की आदत भी थी... मेरे लिए वहाँ सोना थोड़ा मुश्किल था उपर से मेरे बिस्तर से एक साइड आपरेशन थेटर और दूसरी साइड बंद दरवाज़ा जो की खड़ खड़ की आवाज़ कर रहा था.. और सामने खाली बिस्तरों से भरा अंधेरा वार्ड... मैंने एक गहरी सास ली और लाइट बंद करके लेट गई... आँखें बंद करते हुए मैंने सोने की कोशिश की.. पर नींद तो मेरी आखों से जैसे ओझल हो गई .. मैं वही लेटे हुए अपना फोन चलाने लगी... फोन चलाते हुए नजाने कब मेरी आँख लगी... सोते हुए मुझे ऐसा एहसास हुआ कि कोई मेरे पैरों के पास बैठा है... मुझे लगा ऑन्टी को चार्जर चाहिए सोने से पहले वो मुझसे चार्जर मांग रही थी पर उस टाइम मैंने अपना फोन चार्ज लगाया था... ऑन्टी चार्जर लेने आई होगी.. मैंने आलस करते हुए आँखें नही खोली क्योंकि चार्जर मेरे पैरों के पास ही स्विच बोर्ड पर लगा था.. करीब 15 मिनट बाद फिर से मुझे वही एहसास हुआ इस बार ऐसा महसूस हुआ कि मेरे पैरों पैरों के पास बेड पर कोई बैठा है.... मुझे अब आंटी पर थोड़ा गुस्सा आने लगा एक तो मुश्किल से मेरी आँख लगी उपर से ऑन्टी बार बार आकर मुझे डिस्टर्ब करने पर लगी थी... जैसे मैंने आँखें खोलनी चाही वो वहाँ से चली गई... उनके जाने के बाद मैंने अपने पास रखे फोन में एक आँख खोल कर समय देखा करीब 12.30 बजे थे और मैं फिर से सो गई... अचानक उस बेकार से दरवाजे की खड़ खड़ की आवाज़ तेज़ हो गई और मेरी नींद में थोड़ा खलल पड़ा उसके करीब 5 मिनट बाद फिर से ऑन्टी आकर मेरे पैरों के पास बैठ गई जिसका की मुझे एहसास हुआ...लेकिन इस बार कुछ अजीब हुआ वो मेरे एक पैर पर हाथ फेरने लगी.. और हाथ फेरते हुए ही ज़ोर से मेरा पैर जकड़ लिया और दबाने लगी... मैंने उन्हे रोकना चाहा पर उन्हे रोकने के लिए न तो मेरी आँखें खुल पा रही थी न ही मेरे होठ खुल रहे थे.. ऐसा लग रहा था जैसे दोनों गोंद से चिपका दिए गए हो... मैं जितना अपनी आँखें खोलने की कोशिश कर रही थी उतना ही मेरे पैर में दर्द बढ़ रहा था.. चिलाने के लिए मेरी आवाज़ नही निकल पा रही थी... उपर से दरवाज़े की खड़ खड़ और तेज़ हो रही थी जिससे मेरा सिर फट रहा था... अब वो दर्द मेरे पैर से पूरे शरीर में बढ़ने लगी.. और वो मेरा पैर छोड़ कर गला दबाने लगी... मैंने आँखें खोल कर देखने की बहुत कोशिश की पर मैं अपनी आँखें नही खोल पा रही थी... मेरा दम घूटने लगा... क्या आज ये रात मेरी आखरी रात होने वाली थी.. मुझे इतना तो समझ आ गया था कि मेरा बचना मुश्किल है. और ये ऑन्टी नही कोई और है... जो शायद आज मुझे मार डालेगा... मेरे सोचने समझने की शक्ति बंद हो गई कुछ समझ नही आ रहा था कि मेरे साथ क्या हो रहा है.. बस आगे मौत थी जिसे मैं देख नही पा रही थी... मेरी साँसे कम होने लगी और वो जो भी था उसकी पकड़ और मजबूत हो गई... मेरी बंद आँखों के सामने ही अंधेरा शाने लगा.. और फिर मेरे कानों में खड़ खड़ और तेज़ हो गई और इसके साथ ही आई एक अजीब सी तीखी हसने की आवाज़ जो कि ऑन्टी की आवाज़ तो बिल्कुल नही थी.. मैं अपनी आखरी साँसें लेने की कोशिश कर रही थी तभी अचानक से खड़ खड़ की आवाज़ बंद हो गई और साथ ही बंद हो गई वो तीखी हसी.. अब बस एक ही आवाज़ आ रही थी  जो की थी ओम नमः शिवाय... की.. उसके साथ ही मुझे अपने गले पर से पकड़ गायब हो गई और साथ ही मेरा दर्द भी.. मैंने हिम्मत करके अपनी आँखें  खोली... मेरे पास कोई नही था.. मैंने डर कर बाहर झाँका तो ऑन्टी अभी भी गहरी नींद में थी... मैंने खुदको संभाला और अपने माथे पर आए पसीने को पोशा और फोन में वक़्त देखा तो 4.5 हो चुके थे.. और ये आवाज़ जिसने आज मेरी जान बचाई थी वो उसी फैक्टरी से आ रही थी जो यहाँ से थोड़ी दूरी पर थी... मैं बेड पर बैठ गई और सुबह होने का इंतज़ार करने लगी और फोन पर मैंने हनुमान चालीसा लगाया.. और सुबह के 7 बजते ही मैं वहाँ से निकल गई... और वहाँ से नोकरी छोड़ दी और कभी किसी को इस बारे में कुछ नही बताया.।
: KS World

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