कलयुग
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कलयुग
कविता
कलयुग आगे हारा है हर इंसान… कलयुग ने कर दिया है सबका जीना हराम…! ना रातों को चैन है और ना दिनों में सुकून है… हर तरफ इंसान के भेष में छुपे सैतानो ने मचा रखा है कोहराम…!!
लेखक : Ashu
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