उलझन

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उलझन


मैं उलझन में हूँ निकलू कैसे। उलझ ही इतना गया हूँ समझू कैसे।। मैं उलझन में हूँ. ........ सबसे उम्मीद थी कोई समझेगा मुझे । किसी को में  नहीं  समझ सका में  समझू कैसे।। मैं उलझन में हूँ. ....... किसी को जूठन खाता देख हैरान था मैं । उस भूख की तङप  को समझू कैसे।। मै  उलझन में हूँ. ........ बिना छत बिना कपड़े, सर्दी मे ठीठूर रहे थे वो। भर पेट ओढे पहने  उस लाचारी  को समझूं कैसे।। मैं उलझन में हूँ ........ ये आग सर्दी में  शुकून  दे रही है मुझे । कोयला तो पलकर राख  हो गया  ये समझू कैसे।। मैं उलझन में हूँ ........ भूखे-नगे,बेबस,मज़बूर  रोज मर रहे है  लाखों । मेरा कोई अपना जो नहीं तो ये दर्द समझू कैसे।। मैं उलझन में हूँ. ........ वो  फर्क कर रहा होगा इंसान बनाते हुए । पर अब रोता है  इंसान बनाकर।। इंसान - इंसान  को हु न समझ सका ये समझू कैसे।।। मैं  उलझन में हूँ. ........... 🖋️स्वरूप सिह राठौड़  🖋️

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