वो नदी किनारे बीते पल बहूत याद आते
वो नदी किनारे बीते पल
बहूत याद आते है अब
नदी के बहते पानी में
झिलमिलाती सूरज की किरण
जब दिल के तार छेड़ जाया करती थी
कैसे बहता हुआ पानी
मन मे मचलती बातों को
बिन बोले ही सुन लेता था कैसे
सारी परेशानिया साथ ले जाता था जैसे
वो प्यारी उड़ती हुई तितलियाँ
रंग बिरंगे रंगों से कैसे
पल भर में ही दे जाती थी
उड़ने की ख्वाइशे मुझे
वो पत्थर जिस पर बैढा करती थी
उसको आभास होता था मेरे आने का जैसे
खाली मिलता था जब भी जाती थी
किसी और को उढा देता था जैसे
कौन कहता है पेड़ इज़हार नहीं करते है
सूखे पते जब उड़ कर
उलझ जाते थे बालो में ऐसे
बहूत ही पुराना रिश्ता हो जैसे
वो सड़क जिस पर सैर किया करती थी
कितनी अपनी लगती थी वो
जब भी कतराती थी चलने से
ख्यालों में उलझा लेती थी ऐसे
घंटे मिनट में बीत जाया करते थे
बारिश के मौसम में भी
कितना सहारा देती थी वो
कभी फिसलने वाली होती थी तो
हाथ पकड़ लेती थी जैसे
शाम जब ढलती थी
पेड़ो की परछाइयां भी
पानी में जब पड़ती थी
और चाँद भी जब मुझ से
आँख मिचौली खेला करता था जैसे
आँखे बंद करके
गहरी साँसे जब लेती थी
वो ढ़डी हवा के झोंके
छू जाते थे रूह को मेरी जब
स्वर्ग ही लगता था जैसे