पुराना मकान
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पुराना मकान
कविता
गाँव छोड़ शहरों में क्या आ बसे देखो शहर अपने और गाँव पराये लगने लगे मगर शहरों में वो बात कहाँ, आसमाँ छूती इमारतें है, लेकिन दूर, खुली जगह में फैला वो पुश्तेनी मकान कहाँ।
: Dikshu
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