जब जब बादल में ये काली घटा छाती है ,
बारिश की ये बूंदे धरती की प्यास बुझाती है ।
तब मैं एक कागज का टुकड़ा लाती हूँ ।
अपने हाथों से कागज की नाव बनाती हूँ ,
इस बारिश की पानी में अपनी नाव चलाती हूँ ।
पल भर के लिए ही सही अपने बचपन में लौट जाती हूँ ,
वो बचपन की यादें , वो घर आंगन की राहें ।
मुझे याद बड़ी आती हैं ।
पर ये छोटी सी कागज की नाव एक खुशी दे जाती हैं ,
पल भर के लिए मुझे अपने बचपन में ले जाती है ।
कागज की नाव हमे एक बात बताती है ,
मुश्किलों में भी हमे चलने की राह दिखाती है ।
ये कागज की नाव लहरों पर से बच कर निकल जाती हैं ,
कभी डगमगाती फिर सम्भल जाती है ।
फिर ये बात समंदर को भी खल जाती है ,
कागज की नाव मुझ पर कैसे चल जाती है..........⛵🛶⛵🚣🏻♀