जाते-जाते उसने कहा था, "तुम्हारी जैसी हजारों से मिलूंगा।"
मैंने भी सोचा, "मेरी ही जैसी क्यों? क्या मैं इतनी खास थी?"
अगर थी, तो साथ में क्यों थे?
फिर क्यों तुमने रास्ता दूसरा चुना?
सच में बताओ, कारण क्या था?
क्या तुम्हें मेरी दुनिया प्यारी नहीं लगी?
क्या प्यार दो दिलों का मिलन नहीं है?
आखिर इस सूरत में रूप, रंग, धन, धर्म, जात कुछ भी तो मायने नहीं रखता।
लेकिन तुम यह बात कब समझोगे?
कब तक टिकेगा तुम्हारा यह खूबसूरती का घमंड?
पचास, साठ, सत्तर...
उसके बाद तो मुरझा जायेगा, बिखरते हुए गुलाब की तरह।
अब इस बात को सोच कर भी क्या फायदा?
लौटोगे नहीं, यह मुझे पता है।
ना अब तुम मुझे मना पाओगे।
तुम कहते थे ना, "मैं तुम्हें समझ नहीं पाई।"
यहाँ समझ कर ही मैं बाध्य हुई तुमसे अलग होने के लिए।
जो होना था, हो गया।
किस्मत में बिछड़ना था, बिछड़ गए।
नहीं थे हाथों की लकीरों में, जैसे कि गुरुजी ने बताया था।
जान से कोशिश की थी तुम्हें रोकने की,
पर तुम नहीं रुके।
टूट गया दिल जिसे टूटना था।
जो हुआ, सो हुआ।
अब मैं तुम्हें खुश देखना चाहती हूं।
इसलिए प्लीज, अबकी बार मेरी जैसी मत ढूंढना।
क्यों बार-बार एक ही गलती करोगे?
इसलिए अब दूसरी में भी मुझे मत ढूंढना।
जाते-जाते तुमने कहा था, "तुम्हारी जैसी हजारों से मिलूंगा।"
बोलो, मेरी ही जैसी क्यों?