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कविता
आशा और निराशा से बेखबर बस चल रहीं हूं, जिंदगी के सफर में.....! में एक मांझी हू अपनी ही जिन्दगी की, अपनी ही उधेड़ बुन में बस चल रहीं हु अपनी ही धुन में...!
लेखक : Komal
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