यह कविता हमारे जीवन में आने वाले अलग-अलग तरह के लोगों की तुलना सप्ताह के सात दिनों से बेहद व्यंग्यात्मक और मज़ेदार तरीके से करती है। इसमें सोमवार से लेकर गुरुवार तक के लोगों को उधारी के तनाव, ग्रुप चैट की उपेक्षा, उबाऊ समझौते और बिना मांगे ज्ञान देने वालों के रूप में दर्शाया गया है। वहीं शुक्रवार और शनिवार उन दोस्तों और खयाली पुलावों का प्रतीक हैं, जो बड़ी-बड़ी उम्मीदें तो जगाते हैं लेकिन असल में ऐन मौके पर धोखा या सिर्फ आलस ही देते हैं। अंत में, कविता का मुख्य भाव 'इतवार' जैसे लोगों पर आकर टिकता है, जिनका हम बेसब्री से इंतज़ार तो करते हैं, लेकिन वे सुकून के उन पलों या महीने की पहली तारीख वाली कमाई की तरह होते हैं जो आते ही पल भर में खत्म हो जाते हैं। निष्कर्षतः, हमारा मन कभी इन इतवार जैसे लोगों से नहीं भरता और हमारी पूरी ज़िंदगी असल में इन्हीं खूबसूरत पलों के लौट कर आने की प्रतीक्षा में ही कट जाती है, जो कि हमारी असली दुनिया है।