तन्हाई
तन्हाई कोई खाली कमरा नहीं होती,
यह तो यादों की धीमी-धीमी सरगम होती।
भीड़ में भी जो साथ न छोड़े,
वही ख़ामोशी की सबसे गहरी कसम होती।
कभी चाँद से बातें करती है,
कभी तारों में अपना चेहरा ढूँढ़ती है।
रात की ओस बनकर पलकों पर ठहरती,
और सुबह बनकर चुपचाप बिखरती है।
कुछ ज़ख्म समय भर देता है,
कुछ तन्हाई हर रोज़ सीती है।
मुस्कानों के पीछे छिपे दर्द को,
बस ख़ामोशी ही जीती है।
फिर भी तन्हाई दुश्मन नहीं,
यह खुद से मिलने का एक सफ़र है।
जब दुनिया की आवाज़ें थम जाती हैं,
तब अपने दिल की धड़कनों का असर है।
एक दिन यही तन्हाई सिखा जाती है,
कि हर अँधेरी रात का सवेरा होता है।
जो खुद से दोस्ती कर लेता है,
वह कभी सचमुच अकेला नहीं होता है।