बेनाम रिश्ता.....💝❤️
प्रेरणा: इसी तस्वीर की ख़ामोशी और अपनापन
उस रात आसमान पर चाँद पूरा था। लेकिन उसकी रोशनी भी उस छोटे-से आँगन में टिमटिमाती पीली लड़ियों के सामने फीकी लग रही थी। हवा में रजनीगंधा की हल्की-सी खुशबू घुली हुई थी। सब लोग शादी की तैयारियों में व्यस्त थे। मगर उस भीड़ के बीच दो लोग ऐसे भी थे। जो किसी शोर का हिस्सा नहीं थे।
वह सफेद कढ़ाई वाला कुर्ता पहने सीढ़ियों पर बैठा था। उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी। उसके पास गुलाबी सूट पहने एक लड़की चुपचाप अपना सिर उसके कंधे पर टिकाए बैठी थी। दोनों के बीच न कोई वादा था, न कोई इज़हार। बस एक अजीब-सी ख़ामोशी थी। जो शायद हज़ारों शब्दों से ज़्यादा गहरी थी।
उनका रिश्ता कभी किसी नाम का मोहताज नहीं रहा।
उनकी पहली मुलाकात भी किसी फ़िल्मी कहानी जैसी नहीं थी। न टकराना, न कॉफी गिरना, न बारिश। बस एक सरकारी लाइब्रेरी का शांत कोना, जहाँ दोनों एक ही किताब लेने पहुँचे थे। दोनों ने एक-दूसरे को देखा, हल्का-सा मुस्कुराए और बिना कुछ कहे किताब उसे दे दी जिसने पहले हाथ बढ़ाया था।
अगले दिन फिर वही चेहरा दिखा।
फिर अगले दिन।
धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे के लिए अनजाने नहीं रहे। वे कभी साथ बैठकर किताबें पढ़ते, कभी खिड़की के पास बैठकर बारिश देखते। तो कभी बिना किसी वजह के चाय पीते। मज़े की बात यह थी कि उन्होंने कभी यह तय ही नहीं किया कि वे दोस्त हैं या कुछ और।
एक दिन नैना ने पूछा, "अगर कोई पूछे कि हमारा रिश्ता क्या है... तो क्या कहोगे?"
रोहन मुस्कुराया।
"कुछ रिश्तों को नाम देना उन्हें छोटा कर देता है।"
उस दिन के बाद उसने फिर कभी यह सवाल नहीं पूछा।
समय अपनी रफ़्तार से चलता रहा। दोनों की ज़िंदगी बदलती रही। रोहन को दूसरे शहर नौकरी मिल गई। नैना अपने परिवार की ज़िम्मेदारियों में उलझ गई।
अब मुलाकातें कम होने लगीं।
पहले हर शाम बात होती थी। फिर हफ्ते में एक बार, फिर महीने में... और एक दिन ऐसा आया जब पूरे छह महीने तक दोनों ने एक-दूसरे से बात नहीं की।
लेकिन अजीब बात यह थी कि दोनों को कभी यह नहीं लगा कि रिश्ता खत्म हो गया है।
एक रात नैना को अचानक तेज़ बुखार हो गया। अस्पताल के कमरे में आँख खुली तो सामने वही चेहरा खड़ा था।
"तुम...?"
"तुम्हारी दोस्त ने फोन किया था।"
"इतनी दूर से...?"
"कुछ रास्ते दूरी नहीं देखते।"
बस इतना ही कहा उसने।
उस दिन भी किसी ने प्यार का इज़हार नहीं किया।
समय फिर आगे बढ़ गया।
एक दिन नैना की शादी तय हो गई।
कार्ड सबसे पहले उसी के पास पहुँचा।
वह देर तक कार्ड को देखता रहा। फिर मुस्कुराया। किसी ने पूछा, "दुख हो रहा है?"
उसने जवाब दिया, "दुख तब होता अगर उसे कभी खोया होता। वह तो हमेशा मेरी दुआओं में रहेगी।"
शादी वाले दिन उसने दूर खड़े होकर सिर्फ़ एक बार उसे देखा।
नैना की नज़र भी उस पर पड़ी।
दोनों मुस्कुराए।
बस... इतना ही।
न आँसू।
न शिकायत।
न कोई सवाल।
शादी के बाद नैना दूसरे शहर चली गई।
साल बीत गए।
एक दिन सोशल मीडिया पर एक तस्वीर दिखी। वही मुस्कान, वही सुकून, बस अब उसकी गोद में एक छोटी-सी बच्ची थी।
उसने तस्वीर देखकर सिर्फ़ इतना लिखा—
"खुश रहना... हमेशा।"🥰
कुछ ही मिनटों बाद जवाब आया—
"तुम भी।"
और फिर दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी में लौट गए।
कई वर्षों बाद शहर में एक साहित्यिक कार्यक्रम हुआ। दोनों वहाँ फिर मिले।
बालों में हल्की सफेदी आ चुकी थी। चेहरों पर उम्र की लकीरें थीं। लेकिन मुस्कान बिल्कुल वैसी ही थी।
"कैसी हो?"
"अच्छी हूँ... तुम?"
"मैं भी।"
कुछ देर दोनों साथ बैठे रहे।
इस बार भी ख़ामोशी पहले की तरह उनके बीच मौजूद थी।
नैना ने धीरे से कहा,
"जानते हो... मैंने अपने पति को तुम्हारे बारे में बताया था।"
वह थोड़ा चौंका।
"क्या?"
"यही कि मेरी ज़िंदगी में एक ऐसा इंसान था। जिसने कभी मुझसे कुछ माँगा नहीं, कभी कोई वादा नहीं किया। लेकिन हर मुश्किल वक़्त में बिना बुलाए मेरे साथ खड़ा रहा।"
"उन्होंने क्या कहा?"
"उन्होंने मुस्कुराकर कहा... ऐसे लोग किस्मत वालों को मिलते हैं।"
उसकी आँखें भर आईं।🥺🥺
पहली बार।
नैना ने उसका हाथ हल्के से थामा और बोली,
"शायद हमारा रिश्ता अगर किसी नाम में बंध जाता... तो इतना ख़ूबसूरत नहीं रहता।"
वह मुस्कुराया।
"हाँ... कुछ रिश्ते बस महसूस करने के लिए होते हैं।"
शाम ढलने लगी थी। दोनों फिर अपनी-अपनी राह पर चल पड़े।
पीछे मुड़कर किसी ने नहीं देखा।
क्योंकि उन्हें पता था कि कुछ लोग ज़िंदगी से कभी जाते नहीं। वे यादों, दुआओं
और सुकून बनकर हमेशा साथ रहते हैं।
और शायद सच भी यही है...
कभी-कभी कुछ रिश्तों को नाम देने की ज़रूरत नहीं होती।
वे अपने आप बन जाते हैं।
वे प्यार से बड़े, दोस्ती से गहरे और हर रिश्ते से ज़्यादा सच्चे होते हैं।
कैसी लगी ये स्टोरी....🥰💝💝
ये स्टोरी।
हमने अभी लिखा है....💝🖤✍️
— समाप्त —
✍️ श्वेता अग्रवाल 🖤❤️