मन कहता है—मुझे खुला छोड़ दो,
जिधर भी रास्ता दिखे, उधर मोड़ दो।
नियमों की ये दीवारें मुझे चुभती हैं,
तसल्ली से आज मुझे खुद को तोड़ने दो।
मैंने मुस्कुराकर अपने मन से कहा—
सुनो दोस्त, तुम्हारा ये सोचना भी सही है।
पर जो बिना ब्रेक के ही दौड़ती चली जाए,
वह गाड़ी कभी मंज़िल पर पहुँची ही नहीं है।
ये जो पल-पल तुम्हारा मिजाज बदलता है,
अभी कुछ अच्छा, तो अभी कुछ बुरा लगता है।
इस चंचलता को अगर आज़ादी समझ बैठे हो,
तो यकीन मानो, यह सिर्फ एक धोखा लगता है ।
किनारे नदी को कभी कैद नहीं करते,
वे तो बस उसे बहना सिखाते हैं।
मर्यादा की जो एक हल्की सी लकीर है,
उसी के दम पर हम समंदर हो पाते हैं।
भटकना तो इस चंचल मन की फितरत है,
पर हर रास्ते पर मुड़ जाना आज़ादी नहीं।
अपनी ही ख्वाहिशों के पीछे इस कदर भागना,
कि खुद को ही खो दो, यह कोई समझदारी नहीं।
तो आज़ादी बस इतनी सी है मेरे दोस्त,
कि मन तुम्हें न चलाए, तुम मन को चलाओ।
वह भटके भले ही महफ़िलों के पीछे,
पर जब तुम चाहो, उसे चुपचाप घर बुलाओ।