बारिश की हल्की बूँदें खिड़की पर थिरक रही थीं। कमरे में सन्नाटा था, मगर उस सन्नाटे में भी एक भरोसे की आहट थी।
उसने चाय का कप आगे बढ़ाया और मुस्कुरा दिया—बस इतना ही।
ज़िंदगी की थकान, अधूरे सपने, और अनकहे डर… सब कुछ वहीं ठहर गया। कोई वादा नहीं, कोई शर्त नहीं। सिर्फ़ साथ—जो हर मुश्किल को छोटा कर दे।
उसने सोचा, रास्ते चाहे जैसे हों, अगर तुम साथ हो तो मंज़िल अपने आप बन जाती है।
और उस पल समझ आया—ख़ुशी कोई बड़ी बात नहीं, बस साथ का नाम अगर तुम साथ हो