प्रेमचंद की'निर्मला' केवल एक उपन्यास नहीं है, यह एक स्त्री के मौन विद्रोह का महाकाव्य है, जिसे कागज़ की नाव की तरह इस समाज के दरिया में बहा दिया गया। निर्मला केवल एक पात्र ही नहीं वह हर युग की हर उस बेटी का नाम है जिसके सपनों को दहेज की चिता पर लिटा दिया जाता है।