बैवफा़

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बैवफा़


कभी-कभी मोहब्बत अधूरी नहीं होती हम उसे पूरा समझ लेते हैं।“बेवफ़ा” एक ऐसी कहानी है जहाँ खामोशियाँ इकरार बन जाती हैं, और उम्मीदें रिश्तों का नाम।मेहरब ने मिर्जा की हर नज़र, हर चुप्पी को मोहब्बत समझ लिया जबकि मिर्जा ने कभी कुछ कहा ही नहीं।ये कहानी किसी के बदल जाने की नहीं, बल्कि खुद की गलतफहमी से टूट जाने की है। जहाँ दिल सवाल करता है । “क्या वो सच में बेवफ़ा था, या मेरी उम्मीदें?”एक एहसास, जो सिखाता है ।हर साथ हमेशा के लिए नहीं होता,और हर खामोशी प्यार नहीं होती।

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