वजूद!
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वजूद!
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
ये हर उस औरत के मन की बात है, जो सबके लिए जीते-जीते खुद को भूल जाती है। पर फिर भी इस उम्मीद में रहती है, कि एक दिन उसका वजूद भी पहचाना जाएगा।
लेखक : Roshni
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