गूँजते घुँघरू'...

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गूँजते घुँघरू'...


कोठेवाली' शब्द सुनते ही अक्सर लोगों के मन में एक नकारात्मक छवि उभरती है, लेकिन हिंदी साहित्य और इतिहास में यह किरदार केवल मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि त्याग, कला और संघर्ष की एक गहरी दास्तान रहा है। ​यहाँ एक काल्पनिक लेकिन यथार्थवादी लघु कथा है जो उस दौर की एक 'तवायफ' के स्वाभिमान को दर्शाती है:

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