तेरे इश्क़ की डोर

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तेरे इश्क़ की डोर


दो अजनबी, एक इत्तेफ़ाक़ और एक ऐसा रिश्ता, जो बिना किसी नाम के भी गहरा हो गया। राजवीर, गुस्से में ढला हुआ, जज़्बातों से दूर भागता हुआ। वहीं इशानी, सपनों की दुनिया में जीने वाली, जिसकी मुस्कान हर दर्द को भुला दे। दोनों के बीच एक कांच की दीवार खड़ी थी, दर्द की, कुछ गहरी यादों की। जहाँ वो एक-दूसरे के पास होकर भी दूर रहे, और दूर रहकर भी एक इश्क़ की डोर से बंधते चले गए।

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