समर्पण का अर्थ हार मानना नहीं है, बल्कि अपनी शक्तियों को एक दिशा में केंद्रित करना है। जब हम किसी कार्य को बिना किसी शर्त और बिना किसी फल की चिंता किए करते हैं, तो वह समर्पण कहलाता है। भगवद गीता में भी भगवान कृष्ण ने 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' के माध्यम से निष्काम कर्म और समर्पण का ही संदेश दिया है।