सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। घर में हर दिन की तरह हलचल शुरू हो चुकी थी। रसोई से बर्तनों की आवाज़ आ रही थी और साथ ही सरिता की तेज़ आवाज़ भी—
नेहा! जल्दी उठो, कॉलेज नहीं जाना क्या? मम्मी उठ रही हूं थोड़ी देर
नेहा ने करवट बदलते हुए तकिये को अपने चेहरे पर दबा लिया। उसे सुबह जल्दी उठना बिल्कुल पसंद नहीं था। लेकिन माँ की आवाज़ से बचना भी मुश्किल था। कुछ देर बाद वह अनमने मन से उठी और धीरे-धीरे बाथरूम की ओर चली गई।
उधर रसोई में सरिता नाश्ता बनाने में व्यस्त थी। उसके चेहरे पर थकान साफ़ दिख रही थी, लेकिन फिर भी वह हर काम समय पर करने की कोशिश कर रही थी। तभी राजेश कमरे से बाहर आए। उनका चेहरा हमेशा की तरह सख्त और गंभीर था।
“अभी तक नाश्ता तैयार नहीं हुआ?” उन्होंने कुर्सी पर बैठते हुए पूछा।
सरिता ने बिना उनकी तरफ देखे जवाब दिया, “बस बन ही गया है। रोज़ रोज़ लेट क्यों हों जाती हों गुस्से से कहा कभी कोई काम समय पर नहीं करतीं
राजेश ने घड़ी की ओर देखा और भौंहें सिकोड़ लीं। उन्हें हर चीज़ समय पर चाहिए होती थी, और ज़रा सी देरी भी उन्हें गुस्सा दिला देती थी।
कुछ ही देर में पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर बैठा था। रोहन भी आ चुका था, जो हमेशा की तरह चुपचाप अपनी प्लेट में खाना रख रहा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी थी, जैसे वह किसी गहरे सोच में डूबा हो।
“हर दिन यही लेट-लेट!” राजेश अचानक बोले, “किसी को टाइम की वैल्यू है या नहीं?”
नेहा ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “पापा, अभी तो टाइम है… इतना भी क्या गुस्सा?”
राजेश की आँखें तुरंत उसकी तरफ उठीं। “मुझसे बहस मत करो,” उनकी आवाज़ ठंडी लेकिन सख्त थी।
टेबल पर अचानक सन्नाटा छा गया। सरिता ने बात बदलने की कोशिश की, लेकिन माहौल पहले ही भारी हो चुका था।
नेहा ने चुपचाप खाना खत्म किया और बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई। उसे ये रोज़ का तनाव अब सहन नहीं होता था। उसे लगता था कि इस घर में कुछ तो ऐसा है जो सही नहीं है, लेकिन कोई भी खुलकर बात नहीं करता।
कमरे में आकर उसने दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर बैठ गई। उसकी नज़र दीवार पर लगी एक पुरानी पारिवारिक फोटो पर गई। उस फोटो में सब मुस्कुरा रहे थे—माँ, पापा, रोहन और वह खुद। सब कुछ कितना परफेक्ट लग रहा था उस तस्वीर में।
लेकिन हकीकत उससे बिल्कुल अलग थी।
उसे हमेशा लगता था कि उसके पापा उससे थोड़ा अलग व्यवहार करते हैं। रोहन से भी उनका रिश्ता कुछ खास अच्छा नहीं था। दोनों के बीच अक्सर बहस होती रहती थी। जैसे आज सुबह भी माहौल खराब हो गया था।
शाम होते-होते घर का माहौल और भी तनावपूर्ण हो गया।
रोहन ऑफिस से लौटा तो उसका मूड पहले से ही खराब था। जैसे ही उसने राजेश को देखा, उसके अंदर दबा हुआ गुस्सा बाहर आने लगा।
“आपको सिर्फ अपनी इज्जत की पड़ी रहती है,” रोहन ने अचानक कहा।
राजेश ने अखबार से नजर उठाई। “तमीज से बात करो,” उन्होंने सख्ती से कहा, “मैं तुम्हारा बाप हूँ।”
रोहन हँस पड़ा, लेकिन उसकी हँसी में दर्द साफ झलक रहा था। “काश आप होते…” उसने धीरे से कहा।
ये सुनते ही पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। सरिता ने घबराकर रोहन को देखा, जैसे वह उसे चुप कराना चाहती हो। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
राजेश का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “क्या मतलब है तुम्हारा?” उन्होंने तेज आवाज़ में पूछा।
रोहन ने कुछ नहीं कहा। वह बस उन्हें घूरता रहा और फिर अचानक वहाँ से चला गया।
सरिता ने गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर डर और चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
नेहा ये सब दूर से देख रही थी। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ये सब क्या हो रहा है। रोहन ने ऐसा क्यों कहा? और माँ इतनी परेशान क्यों लग रही थी?
रात हो चुकी थी। घर में सब अपने-अपने कमरों में थे, लेकिन किसी को नींद नहीं आ रही थी।
नेहा अपने कमरे में इधर-उधर टहल रही थी। उसके दिमाग में बार-बार वही सवाल घूम रहा था—“काश आप होते…”
इसका मतलब क्या था?
क्या रोहन कुछ ऐसा जानता था जो उसे नहीं पता?
उसी बेचैनी में उसने अलमारी खोल दी। वह कुछ ढूंढ नहीं रही थी, बस उसका मन शांत नहीं हो रहा था। तभी उसकी नजर एक पुरानी फाइल पर पड़ी, जो अलमारी के कोने में रखी थी।
वह फाइल थोड़ी धूल से ढकी हुई थी, जैसे उसे बहुत समय से किसी ने छुआ न हो।
नेहा ने धीरे से उसे उठाया। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था, जैसे उसे पहले से अंदाज़ा हो कि इसमें कुछ ऐसा है जो सब कुछ बदल सकता है।
उसने फाइल खोली।
अंदर कुछ पुराने कागज़ थे—हॉस्पिटल के रिकॉर्ड, कुछ दस्तावेज़, और एक जन्म प्रमाण पत्र।
नेहा ने जैसे ही उस कागज़ को ध्यान से देखा, उसकी सांसें थम गईं।
उस पर उसके नाम के आगे पिता का नाम लिखा था… लेकिन वो नाम राजेश नहीं था।
उसकी आँखें फैल गईं। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह जो देख रही है, वो सच है।
“ये… कैसे हो सकता है?” उसने धीरे से खुद से कहा।
उसके हाथ काँपने लगे। दिमाग सुन्न पड़ गया। उसे ऐसा लगा जैसे उसकी पूरी दुनिया एक पल में हिल गई हो।
क्या इसका मतलब…?
क्या राजेश उसके असली पिता नहीं हैं?
उसके दिमाग में एक के बाद एक सवाल उठने लगे। माँ ने ये बात उससे क्यों छुपाई? रोहन को क्या पता है? और सबसे बड़ा सवाल—उसका असली पिता कौन है?
कमरे में गहरा सन्नाटा था। बाहर कहीं दूर कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी, लेकिन उसके अंदर एक तूफान चल रहा था।
नेहा ने फाइल बंद की और बिस्तर पर बैठ गई। उसकी आँखों में आँसू आ गए, लेकिन वह रो भी नहीं पा रही थी।
आज तक जिस परिवार को वह अपना सब कुछ मानती थी, उसी के बारे में इतना बड़ा सच सामने आ गया था।
और अब… कुछ भी पहले जैसा नहीं रहने वाला था।