जेल की ठंडी दीवारें जैसे उसकी साँसों को भी कैद कर रही थीं। वो कोने में बैठा था, सिर झुकाए… दिमाग में सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा था—
“अगर मैंने नहीं किया… तो फिर किसने किया?”
तभी उसके सामने किसी के कदमों की आहट हुई।
उसने सिर उठाया।
एक आदमी उसके सामने खड़ा था—साफ-सुथरा सूट, तेज नजरें, और चेहरे पर अजीब सी शांति।
“मैं ओम त्रिवेदी हूँ… तुम्हारा केस अब मैं देख रहा हूँ।”
वरुण की आँखों में एक उम्मीद की हल्की सी चमक आई।
“सर… मैंने सच में कुछ नहीं किया… मुझे कुछ याद नहीं…”
ओम ने कुछ सेकंड तक उसे चुपचाप देखा… जैसे वो उसके शब्द नहीं, उसकी आत्मा पढ़ रहा हो।
“याद नहीं… या याद नहीं करना चाहते?” ओम ने धीमे से पूछा।
“नहीं सर… सच में… मुझे सिर्फ इतना याद है कि वो मेरे साथ थी… फिर…”
उसकी आवाज़ कांप गई।
ओम थोड़ा झुका और धीमी आवाज़ में बोला—
“तो फिर हमें उस रात को वापस लाना होगा…”
वरुण ने उसकी तरफ देखा… डर और उम्मीद दोनों के साथ।
“कैसे…?”