मुंबई... सपनों का शहर। जहाँ लोग अपनी पहचान बनाने आते हैं, लेकिन अवनी यहाँ अपनी पहचान छुपाने आई थी।पर उसे क्या पता था कि लोकल ट्रेन की भीड़ हो या वर्ली की ऊँची इमारतें, लोगों की गंदी नज़रें और उनके ताने उसका पीछा कभी नहीं छोड़ेंगे।
अवनि सुबह-सुबह कुर्ला के एक छोटे से चॉल से बाहर निकली। उसने अपने दुपट्टे से अपना चेहरा अच्छी तरह ढँक रखा था, लेकिन पड़ोस के खिड़कियों से झाकती बाज नज़रों से कैसे बच पायेगी?
"देखो, फिर से सज-धज के निकल गई," पड़ोस वाली कांता मौसी ने ज़ोर से कहा। "इतना बड़ा कांड हो गया, पूरा मोहल्ला थू-थू कर रहा है, पर मैडम को देखो... अभी भी खुले आम बाहर घूम रही है अरे.... नौकरी चाहिए मेडम को... अरे, जिस लड़की की इज़्ज़त बाज़ार में नीलाम हो गई हो, उसे घर में बैठना चाहिए या ज़हर खा लेना चाहिए।"
अवनि ने अपने कान बंद कर लिया, वो रो रही थी लेकिन उसके आँसू उसके चेहरे पर गिरे बारिश के पानी से मिल गया था।
"सॉरी अवनि जी," एच.आर. मैनेजर ने उसकी फाइल बंद करते हुए कहा। " पास्ट में आपके साथ जो हुआ वो न्यूज़ चैनल के मेहरबानी से पूरे मुंबई को पता है। हमारी कंपनी अपनी इमेज को लेकर बहुत सतर्क है। हम एक 'रेप सर्वाइवर' को डेस्क जॉब देकर रोज़-रोज़ मीडिया के लफड़े नहीं पाल सकते।"
सर, गुनहगार वो थे, मैं नहीं। मेरी काबिलियत मेरी फाइल में है, मेरे अतीत में नहीं।"
"शायद... पर समाज की नज़र में तो आप ही 'दागी' हैं। आप जा सकती हैं।"
अवनि लड़खड़ाते कदमों से बाहर आई और मरीन ड्राइव की किनारे पर जाकर बैठ गई। सामने समुद्र की लेहरे उफन्द रहे थे उससे कही गुणा ज्यादा उसके मन में दुखों की लेहरे उफन्द रहे थे।
आखिर क्यों... क्यों सब उसे ही दोष दे रहे है? इस में उसकी क्या गलती? उन पापियों को तो कोई देख ही नही रहा है... यह सब सोच के वो फुट फुट कर रोने लगी।
"मुंबई में रोने के लिए बहुत जगह है, पर चुप कराने वाला कोई नहीं," एक लड़की की आवाज़ आई।
अवनि ने देखा, एक बेहद स्टाइलिश और ज़िंदादिल लड़की उसके पास खड़ी थी। उसके हाथ में एक कॉफी का कप था।
"हाय, मैं ज़ोया। पिछले आधे घंटे से तुम्हें देख रही हूँ। यहाँ मरीन ड्राइव पर लोग रोमांस करने आते हैं, तुम जैसे सुसाइड वाला चेहरा लेकर बैठने नहीं।"
ज़ोया की बातों में एक अजीब सी बेबाकी और अपनापन था।
अवनि देखती ही रही।
क्या हुआ बोलो क्यों रो रही थी? जोया ने पूछा
अवनि पहले हिचकिचाई लेकिन जोया ने बेहद अपनेपन से पूछा तो सारी बात बताई सिवाई अपने साथ हुए उस हादसे को छोड़ के।
ज़ोया ने अवनि का हाथ पकड़ा और उसे एक छोटी एड-एजेंसी में नौकरी दिलवा दी। अगले दो महीनों में, अवनि और ज़ोया की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि अवनि को लगा शायद उसकी ज़िंदगी फिर से पटरी पर आ सकती है।
दो महीने बाद......
जारी है........
मुंबई... सपनों का शहर। जहाँ लोग अपनी पहचान बनाने आते हैं, लेकिन अवनी यहाँ अपनी पहचान छुपाने आई थी।पर उसे क्या पता था कि लोकल ट्रेन की भीड़ हो या वर्ली की ऊँची इमारतें, लोगों की गंदी नज़रें और उनके ताने उसका पीछा कभी नहीं छोड़ेंगे।
अवनि सुबह-सुबह कुर्ला के एक छोटे से चॉल से बाहर निकली। उसने अपने दुपट्टे से अपना चेहरा अच्छी तरह ढँक रखा था, लेकिन पड़ोस के खिड़कियों से झाकती बाज नज़रों से कैसे बच पायेगी?
"देखो, फिर से सज-धज के निकल गई," पड़ोस वाली कांता मौसी ने ज़ोर से कहा। "इतना बड़ा कांड हो गया, पूरा मोहल्ला थू-थू कर रहा है, पर मैडम को देखो... अभी भी खुले आम बाहर घूम रही है अरे.... नौकरी चाहिए मेडम को... अरे, जिस लड़की की इज़्ज़त बाज़ार में नीलाम हो गई हो, उसे घर में बैठना चाहिए या ज़हर खा लेना चाहिए।"
अवनि ने अपने कान बंद कर लिया, वो रो रही थी लेकिन उसके आँसू उसके चेहरे पर गिरे बारिश के पानी से मिल गया था।
"सॉरी अवनि जी," एच.आर. मैनेजर ने उसकी फाइल बंद करते हुए कहा। " पास्ट में आपके साथ जो हुआ वो न्यूज़ चैनल के मेहरबानी से पूरे मुंबई को पता है। हमारी कंपनी अपनी इमेज को लेकर बहुत सतर्क है। हम एक 'रेप सर्वाइवर' को डेस्क जॉब देकर रोज़-रोज़ मीडिया के लफड़े नहीं पाल सकते।"
सर, गुनहगार वो थे, मैं नहीं। मेरी काबिलियत मेरी फाइल में है, मेरे अतीत में नहीं।"
"शायद... पर समाज की नज़र में तो आप ही 'दागी' हैं। आप जा सकती हैं।"
अवनि लड़खड़ाते कदमों से बाहर आई और मरीन ड्राइव की किनारे पर जाकर बैठ गई। सामने समुद्र की लेहरे उफन्द रहे थे उससे कही गुणा ज्यादा उसके मन में दुखों की लेहरे उफन्द रहे थे।
आखिर क्यों... क्यों सब उसे ही दोष दे रहे है? इस में उसकी क्या गलती? उन पापियों को तो कोई देख ही नही रहा है... यह सब सोच के वो फुट फुट कर रोने लगी।
"मुंबई में रोने के लिए बहुत जगह है, पर चुप कराने वाला कोई नहीं," एक लड़की की आवाज़ आई।
अवनि ने देखा, एक बेहद स्टाइलिश और ज़िंदादिल लड़की उसके पास खड़ी थी। उसके हाथ में एक कॉफी का कप था।
"हाय, मैं ज़ोया। पिछले आधे घंटे से तुम्हें देख रही हूँ। यहाँ मरीन ड्राइव पर लोग रोमांस करने आते हैं, तुम जैसे सुसाइड वाला चेहरा लेकर बैठने नहीं।"
ज़ोया की बातों में एक अजीब सी बेबाकी और अपनापन था।
अवनि देखती ही रही।
क्या हुआ बोलो क्यों रो रही थी? जोया ने पूछा
अवनि पहले हिचकिचाई लेकिन जोया ने बेहद अपनेपन से पूछा तो सारी बात बताई सिवाई अपने साथ हुए उस हादसे को छोड़ के।
ज़ोया ने अवनि का हाथ पकड़ा और उसे एक छोटी एड-एजेंसी में नौकरी दिलवा दी। अगले दो महीनों में, अवनि और ज़ोया की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि अवनि को लगा शायद उसकी ज़िंदगी फिर से पटरी पर आ सकती है।
दो महीने बाद......
जारी है........