आँखों में जो ये मेरे खालीपन है,
ये मंज़र किसी उजड़ी हुई बस्ती का लगता है......
ये मलाल वो नहीं जो दुनिया ने दिया था मुझे,
मेरी ही किसी उम्मीद का क़र्ज़ है जो कभी चुका नहीं.....
कंकड़ लगते हैं वो लफ्ज़ जो गले में ही अटक गए,
या फिर किसी अपने के बदलते लहजे का घाव लगता है.....
ये बीता हुआ कल ही है मेरा,
जो दीमक की तरह मुझे अंदर से खा रहा है.....
ये जो कसक उठती है रातों को अचानक,
किसी की बददुआओं का हिसाब लगता है.....
मैं चाहकर भी आज़ाद नहीं हो पाती हूँ उन यादों से,
जाने लोग कैसे सब राख कर के फिर से मुस्कुराने लगते हैं.....