दूर थे पर मिलने का यकीन भी था

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दूर थे पर मिलने का यकीन भी था


यह कविता दो दिलों की कहानी है जो दूर रहकर भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। मिलना शायद एक ख़्वाब था, पर उस ख़्वाब पर यक़ीन सच्चा था। दूरियाँ जिस्मों की थीं, दिलों की नहीं। अधूरी मोहब्बत भी कभी-कभी पूरी लगती है, क्योंकि उसमें इंतज़ार, विश्वास और सच्चाई बसती है। यह प्रेम के उसी एहसास की दास्तान है, जो बिछड़कर भी हमेशा ज़िंदा रहता है।

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