प्रेम…
यह शब्द जितना छोटा है, उतना ही गहरा समंदर अपने भीतर समेटे रहता है।
कभी यह बसंत की पहली हवा बनकर मन को छू जाता है…
तो कभी किसी तुलसी चौरे के सामने खड़े होकर चुपचाप मन की मन्नत बन जाता है।
"पिया बसंती" केवल एक प्रेम कहानी नहीं…
यह उन भावनाओं की यात्रा है, जहाँ प्रेम शोर नहीं करता…
बल्कि धीमे से किसी दिल में घर बना लेता है।
यह कहानी दो ऐसे दिलों की है
जो मिले तो संयोग से…
पर जुड़ गए शायद नियति से।
इस कहानी में प्रेम होगा…
इंतज़ार होगा…
संघर्ष होगा…
और वह मासूमियत भी होगी, जो आज के समय में धीरे-धीरे खोती जा रही है।
बसंती रंग केवल मौसम का नहीं होता…
कभी-कभी यह दिलों पर भी चढ़ जाता है।
और जब प्रेम बसंती हो जाए…
तो जीवन महकने लगता है।